तरह-तरह के हथकंडे अपना आमजन को लूटने का खेल चलता रहा है। बेरोजगारों को रोजगार, निवेशकों का धन दूना चौगुना का खेल से आमजनमानस अछूता नहीं है। सदियों से चिटफंड बैकिंग सेवा भारत में भी खुब छायी रहीं। तब सरकारी बैंकों से निवेशकों का रूझान कम था। बेरोजगार युवाओं को कमिशन देकर चिटफंड बैक संचालकों ने अथाह धन अर्जित की मनमोहन सिंह कि सरकार तक करोड़ों बेरोजगारों को रोजगार और निवेशकों का धन दो चार साल में दो चार गुना देतीं रहीं। गुजरात के तर्ज पर देश का विकास झांसे में आकर देश की जनता 2014 में नरेंद्र भाई मोदी कि सरकार पूरी बहुमत से केंद्र में बना दी।
मोदी जी आते ही एक अपने फार्मूला से नेशनल बैकों को बड़ा तोहफा दिए न चिटफंड बैकिंग रहेगी न लोगों का पैसा फंसेगा और सरकार अपनी मर्जी से जनता के रुपये का व्याज देना निर्धारित करेगी तभी तो सरकार को फायदा होगा और देश हित में सरकार खर्च करेगी।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चिटफंड बैकों पर मेहरबानी आम-जन का जमा पूंजी लेकर हुई फुर्र
अगर चिटफंड बैंकों का संचालन देश में गैरकानूनी था तो 2014 तक तमाम लाईसेंस और अनुमति उन चिटफंडों को कैसे मिला था? अगर मोदी सरकार उन्हें गैरकानूनी तरीके से पाईं तो आमजन का क्या दोष जो जमा पूंजी वापस नही दिलवाया? उन पर शिकंजा कस अर्जित संपत्ति से निवेशकों का धन वापस क्यो नही कराया गया? तब देश में करोडो लोग उन चिटफंड बैकिंग संस्थाओ से रोजगार युक्त थे परिवार का भरण-पोषण करते थे, साथ ही कम पूंजी वाले उन के झांसे में आकर धन दूना चार गुना के चक्कर में अपनी थोड़ी बहुत पूरी पूंजी गवा बैठे।
आखिर इसके लिए दोषी करार किसे दिया जाए। आरओसी, आरबीआई, सेवी, आदि सरकारी संस्थाओं की पेपर देख दिखा चिटफंड बैकिंग का कारोबार फलता-फूलता रहा। आज वो सब सरकारी संस्थाओं की तमाम जारी पेपर्स का प्रभाव कहां गया। सब गैर कानूनी था तो मोदी सरकार अपने सरकारी संस्थाओं द्वारा वो तमाम पेपर देकर चिटफंडों का बढावा देने वाली अपने सरकारी संस्थाओं पर आज तक कौन-कौन सी कार्यवाही की? मोदी सरकार बनते ही चिटफंडों के संचालक बड़े-बड़े पहुंचे फकीर निकले और निवेशकों का कोई नही, यह आमजन की हितैषी मोदी सरकार के कार्यकाल में ही सब संभव हुआ।
देश भर से गरीब बेजुबान निवेशकों का धन हड़प का खेल, जन धन खाते के नाम पर जब खुद मोदी सरकार अभियान चला हर गरीब का हजार दो हजार डकार बैठ गयी तो वे चिटफंड संचालक क्यो नही बैठे रहे?
सच ही कहा गया है राजा को संन्यासी होना ठीक, संन्यासी को राजा होना ठीक नहीं होता। जब राजा निर्वंशीं होता है तो उसे किसी के वंश का दर्द समझ नही आता वही हाल आज देश, प्रदेश का है। इस देश से घोटालेबाज घोटाला कर विदेश भाग जाते हैं और इस देश की सरकार को दो चार दिन बाद मिडिया में प्रकाशित खबर के बाद होता है फिर भी सरकार के पास वैसा कोई कानून नहीं जिसके सहारे उन भगोड़े पर शिकंजा कस सरकारी पैसा ही वापस करा ले। तो यह सरकारी तंत्र गरीब निवेशकों का पैसा कैसे वापस करायेंगे।
इस देश में गरीबों को लूटने की छूट है गरीबों को लूटो और ऐंस करो सदियों से होता रहा है और अब भी हो रहा है। पहले आफलाइन था अब आनलाइन, आज भी न जाने कितनी तरह से लूटने का खेल खेला जा रहा है। अभी तक तो आमजन को लूटा जा रहा था अब तो मीडिया के नाम पर मिडिया वर्कर्स को भी लूटो खाओ अभियान देखने को मिला।
एपेक्स के नाम से कोई भी व्यक्ति इस समय अपरिचय नही है ऐप एक्स साफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी है बिते साल इन्टरनेशनल मिडिया के नाम पर एक मोबाइल एप्लीकेशन के द्वारा संचालित नेटवर्किंग मिडिया कुछ बेरोजगार नेटवर्क वर्कर्स के द्वारा मिडिया वर्कर्स तक आया चौरासी देश की खबर एक एप्लीकेशन से देखने को था मेमर बनने के लिए तीन सौ एक डालर लाइफटाइम देखने के एवज में अगले को प्रमोट करने पर तीन डालर तत्काल मिल रहा था। पिन पैकेज होलसेल एक डालर लगभग 70 रूपये फायदा तो इतना की पूछिए मत नही कुछ कर सकते तो पिन पैकेज ही लेकर सिर्फ न्यूज एप्लीकेशन रोज एक बार खोलिए बीस माह में पूंजी चार गुना।
न्यूज देने पर डालर न्यूज देखने पर डालर, डालर ही डालर दो तीन साल में ही न जाने कितने खरबों भारतीय रुपये को एपेक्स के नाम पर लूट लिया अभी-अभी तो क्या यह मोदी सरकार के संज्ञान में तब नही आया जब संचालन हो रहा था। जब देनदारी देख मिडिया वर्कर्स भी अपनी पूंजी लूटा सकते हैं और यह लूटेरे मिडिया के नाम पर भी मिडिया वर्कर्स को इस देश में लूट सकती हैं तो भला लूटने से कौन अछूता रहने वाला।
भारतीय कानून के सहारे इन लूटेरो को सजा और जाने-अनजाने में फंसे निवेशकों का पैसा वापस नहीं होता बल्कि लूटने वाले ये सब मस्त जिवन व्यतित करते हैं। अगर सरकार गरीब निवेशकों के प्रति उदार और लूटेरे भगोड़े के प्रति सक्त होती तो लूट का खेल खेलने का कोई दुस्साहस नही करता। लेकिन यहां तो ऊपर से कुछ और अन्दरूनी कुछ और ही चलता है जैसे हाथी का दांत खाने का अलग दिखाने का अलग है। हाथीदांत ही सरकार के कामकाज पर सटीक नजर आ रहा है।
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