भारतीय शास्त्रों में शरीर में ऊर्जा के प्रवाह का विश्लेषण अत्यंत गहनता से किया गया है। ऊर्ध्व और अधः क्रम के विज्ञान का उल्लेख विशेष रूप से कामसूत्र, रतिमंजरी, और अन्य शास्त्रों में मिलता है। यह विज्ञान न केवल शरीर के काम केंद्रों को समझने में मदद करता है, बल्कि इसमें मानसिक और आध्यात्मिक विकास के संकेत भी छुपे हैं।
इस ऊर्ध्व और अध: क्रम का विज्ञान ऊर्जा प्रवाह का गूढ़ रहस्य शिर्षक में श्री चित्रगुप्त जी महाराज के देव वंश-अमित श्रीवास्तव जो गुप्त रहस्यों को बताने जा रहे हैं वो अत्यंत ही दुर्लभ है, तो ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से अंत तक इत्मिनान से पढ़ें समझें और जीवन में लेखनी को सार्थक करें साथ ही अधिक से अधिक लोगों को शेयर कर कर्म धर्म की लेखनी, संचित ज्ञान को बांटने में मदद करें। कमेंट बॉक्स में अपना बहुमूल्य विचार व्यक्त करें और क्या जानना चाहते हैं हमें लिखकर बताएं।
Table of Contents
ऊर्ध्व क्रम का अर्थ
ऊर्ध्व का अर्थ है ऊपर की दिशा में। यह शरीर में ऊर्जा के ऊपर की ओर प्रवाह को इंगित करता है।
ऊर्ध्व क्रम में ऊर्जा का प्रवाह: ऊर्ध्व क्रम का प्रवाह चंद्रमा के शुक्ल पक्ष – अमावस्या से पूर्णिमा तक, में अधिक सक्रिय होता है। इस समय, स्त्री के बाएं अंग और पुरुष के दाहिने अंग में ऊर्जा का अधिक संचार होता है। ऊर्ध्व क्रम का उद्देश्य सृजनात्मक शक्ति को बढ़ाना और मानसिक शांति प्रदान करना है।
ऊर्ध्व क्रम में काम ऊर्जा के केंद्र
स्त्रियों में-पैर की उंगलियों से लेकर अंगूठे, घुटने, नाभि, स्तन, कंठ, कपोल, और मस्तक तक ऊर्जा का प्रवाह ऊपर की ओर होता है।
पुरुषों में- ऊर्जा का प्रवाह छाती, कंधों, दाहिने अंग, और मस्तक तक केंद्रित होता है।
ऊर्ध्व क्रम का प्रभाव- यह मानसिक शांति और आत्मविश्वास को बढ़ाता है। काम ऊर्जा को शरीर के निचले हिस्से से उठाकर उच्च चक्रों – मस्तिष्क और हृदय तक ले जाता है। आध्यात्मिक साधना और ध्यान के लिए ऊर्जा का संतुलन बनाता है।
अधः क्रम का अर्थ
अधः का अर्थ है नीचे की दिशा में। यह शरीर में ऊर्जा के नीचे की ओर प्रवाह को इंगित करता है।
अधः क्रम में ऊर्जा का प्रवाह- अधः क्रम का प्रवाह चंद्रमा के कृष्ण पक्ष – पूर्णिमा से अमावस्या तक में अधिक सक्रिय होता है। इस समय, स्त्री के दाहिने अंग और पुरुष के बाएं अंग में ऊर्जा का संचार होता है। अधः क्रम का उद्देश्य कामुकता को बढ़ावा देना और सृजनात्मक शक्ति को प्रकट करना है।

अधः क्रम में काम ऊर्जा के केंद्र
स्त्रियों में- मस्तक, कपोल, कंठ, स्तन, नाभि, घुटने, पैर की उंगलियां, और पैर के तलवे तक ऊर्जा का प्रवाह नीचे की ओर होता है।
पुरुषों में- ऊर्जा का प्रवाह मस्तक से लेकर हृदय, पेट, और निचले अंगों तक केंद्रित होता है।
अधः क्रम का प्रभाव- यह शरीर की कामुक ऊर्जा को जाग्रत करता है। प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है। शारीरिक संतुष्टि और आनंद की अनुभूति कराता है।
ऊर्ध्व और अधः क्रम का चक्र: शुक्ल और कृष्ण पक्ष:
ऊर्ध्व और अधः क्रम का प्रवाह चंद्रमा के दोनों पक्षों – शुक्ल और कृष्ण से जुड़ा हुआ है।
शुक्ल पक्ष ऊर्ध्व क्रम- इस दौरान शरीर की ऊर्जा सकारात्मक दिशा में प्रवाहित होती है। स्त्री के बाएं अंग और पुरुष के दाहिने अंग अधिक ऊर्जावान होते हैं। यह समय मानसिक विकास और आत्मशुद्धि के लिए उत्तम माना जाता है।
कृष्ण पक्ष अधः क्रम- इस दौरान शरीर की ऊर्जा नकारात्मक दिशा में प्रवाहित होती है। स्त्री के दाहिने अंग और पुरुष के बाएं अंग अधिक ऊर्जावान होते हैं। यह समय कामुकता और सृजनात्मक क्रियाओं के लिए उपयुक्त होता है।
दोनों पक्षों का महत्व- शुक्ल पक्ष में ध्यान, योग, और मानसिक शांति के लिए उपयुक्त वातावरण बनता है। कृष्ण पक्ष में भौतिक सुख, रतिक्रिया, और सृजन के लिए अनुकूलता रहती है।
ऊर्ध्व और अधः क्रम का चक्र: शुक्ल और कृष्ण पक्ष का विस्तृत वर्णन
ऊर्ध्व और अधः क्रम का चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा प्रवाह के दो प्रमुख मार्ग हैं, जो चंद्रमा के शुक्ल पक्ष Waxing Moon और कृष्ण पक्ष Waning Moon के साथ जुड़ते हैं। इनका संबंध हमारे चक्रों, ऊर्जा संतुलन, और मानसिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक स्वास्थ्य से है।
ऊर्ध्व और अधः क्रम का अर्थ
ऊर्ध्व क्रम: इसका अर्थ है ऊर्जा का ऊपर की ओर प्रवाह। यह आध्यात्मिक विकास, चेतना की वृद्धि, और मानसिक शुद्धि का प्रतीक है।
अधः क्रम: इसका मतलब है ऊर्जा का नीचे की ओर प्रवाह। यह भौतिक आवश्यकताओं, स्थिरता, और सुरक्षा की पूर्ति से संबंधित है।
शुक्ल और कृष्ण पक्ष का ऊर्ध्व-अधः क्रम से संबंध
शुक्ल पक्ष
Waxing Moon
ऊर्जा प्रवाह: शुक्ल पक्ष में ऊर्जा ऊर्ध्वक्रम (उपरि प्रवाह) की ओर जाती है।
भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रभाव: इस समय व्यक्ति में सकारात्मकता, ऊर्जा, और उत्साह बढ़ता है। यह पक्ष शरीर और मन को नई ऊर्जा और स्थिरता प्रदान करता है।
शारीरिक प्रभाव: चक्रों का ऊपर की ओर जागरण और ऊर्जा संतुलन होता है। इस समय ध्यान, प्राणायाम, और योगासन करना अधिक प्रभावी होता है।
कृष्ण पक्ष
Waning Moon
ऊर्जा प्रवाह: कृष्ण पक्ष में ऊर्जा अधःक्रम (नीचे प्रवाह) की ओर जाती है।
भावनात्मक और भौतिक प्रभाव: व्यक्ति में स्थिरता और भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रवृत्ति बढ़ती है। यह पक्ष आत्मनिरीक्षण, विश्राम, और शरीर के भौतिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने का समय है।
शारीरिक प्रभाव: शरीर के निचले भाग, जैसे मूलाधार चक्र, अधिक सक्रिय होते हैं। इस समय व्यायाम और भौतिक कार्यों पर ध्यान देना उपयोगी होता है।
ऊर्जा प्रवाह और चक्रों का संतुलन
ऊर्ध्व क्रम- ऊर्ध्व क्रम में, ऊर्जा निम्नलिखित चक्रों से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है।
1. मूलाधार चक्र 2. स्वाधिष्ठान चक्र 3. मणिपुर चक्र 4. अनाहत चक्र 5. विशुद्ध चक्र 6. आज्ञा चक्र 7. सहस्रार चक्र। यह प्रवाह आत्मा की उन्नति और चेतना की वृद्धि में सहायक है।
अधः क्रम- अधः क्रम में, ऊर्जा सहस्रार चक्र से मूलाधार चक्र की ओर प्रवाहित होती है।
7 सहस्रार चक्र 6. आज्ञा चक्र 5. विशुद्ध चक्र 4. अनाहत चक्र 3. मणिपुर चक्र 2. स्वाधिष्ठान चक्र 1. मूलाधार चक्र। यह प्रवाह जीवन की भौतिक आवश्यकताओं और स्थिरता को बनाए रखने में सहायक है।
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के दौरान चक्रों पर प्रभाव
शुक्ल पक्ष में प्रभाव- ऊर्जा चक्रों के ऊपरी भाग, जैसे विशुद्ध, आज्ञा, और सहस्रार चक्र, अधिक सक्रिय होते हैं। ध्यान, ज्ञान, और रचनात्मकता में वृद्धि होती है। ऊर्ध्वक्रम में कुंडलिनी जागरण अधिक प्रभावी होता है।
कृष्ण पक्ष में प्रभाव- ऊर्जा चक्रों के निचले भाग, जैसे मूलाधार, स्वाधिष्ठान, और मणिपुर चक्र, अधिक सक्रिय होते हैं। भौतिक आवश्यकताओं, स्थिरता, और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित होता है। अधः क्रम में ऊर्जा शरीर के निचले हिस्सों को संतुलित करती है।
शुक्ल और कृष्ण पक्ष में ध्यान का महत्व
शुक्ल पक्ष का ध्यान – ऊर्ध्व क्रम ध्यान में, सहस्रार चक्र की ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करें। ओम या सत्यम् शिवम् सुंदरम् मंत्र का जाप करें। ध्यान के दौरान श्वास को हल्का और शांत रखें।
कृष्ण पक्ष का ध्यान – अधः क्रम ध्यान में, मूलाधार चक्र और पृथ्वी तत्व पर ध्यान केंद्रित करें। लम मंत्र का जाप करें। गहरी और स्थिर सांस लें।
शुक्ल और कृष्ण पक्ष के व्यावहारिक लाभ
शुक्ल पक्ष– मानसिक स्थिरता और सकारात्मकता। आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उन्नति। ऊर्जा का ऊपर की ओर प्रवाह।
कृष्ण पक्ष– भौतिक स्थिरता और सुरक्षा। शरीर और मन का शुद्धिकरण। ऊर्जा का नीचे की ओर प्रवाह।
ऊर्ध्व-अधः क्रम का वैज्ञानिक महत्व
चंद्रमा का चक्र (शुक्ल और कृष्ण पक्ष) समुद्र की ज्वार-भाटा पर प्रभाव डालता है। मानव शरीर, जो 70 प्रतिशत जल से बना है, चंद्रमा के चक्र से प्रभावित होता है। ऊर्जा प्रवाह (ऊर्ध्व-अधः क्रम) इसी सिद्धांत पर आधारित है।
कुंडलिनी जागरण और चक्र संतुलन में इनका महत्व

कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में सुप्त होती है। शुक्ल पक्ष में कुंडलिनी शक्ति सहस्रार चक्र की ओर जागृत होती है। कृष्ण पक्ष में कुंडलिनी शक्ति मूलाधार और भौतिक चक्रों पर केंद्रित रहती है।
ऊर्ध्व और अधः क्रम का विज्ञान ऊर्जा प्रवाह को समझने और जीवन में स्थिरता तथा आत्मज्ञान प्राप्त करने में सहायक है। शुक्ल और कृष्ण पक्ष के दौरान ऊर्जा का क्रमिक परिवर्तन हमें भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने का अवसर देता है।
इन चक्रों को जागृत और संतुलित रखने के लिए ध्यान, योग, और प्राणायाम का अभ्यास आवश्यक है।
ऊर्जा प्रवाह और शरीर के चक्र
ऊर्ध्व और अधः क्रम का विज्ञान शरीर के सात चक्रों – ऊर्जा केंद्रों, से भी जुड़ा हुआ है। महत्वपूर्ण दो चक्रों का उल्लेख क्रमशः अगले लेख में कर रहे हैं जो रतिक्रिया से खासकर जूड़ा हुआ माना गया है।

मूलाधार चक्र
Root Chakra
अधः क्रम की ऊर्जा का प्रमुख केंद्र। भौतिक सुख और प्रजनन ऊर्जा को नियंत्रित करता है। विस्तार से पढ़ने के लिए क्रमशः अगली लेखनी को पढ़िए। इस मूलाधार चक्र पर आधारित गूगल पर पाठकों के सवालों का जवाब सुस्पष्ट भाषा में अंकित कर रहे हैं।
सहस्रार चक्र
Crown Chakra
ऊर्ध्व क्रम की ऊर्जा का प्रमुख केंद्र। आध्यात्मिक विकास और मानसिक संतुलन का कारक। क्रमशः मूलाधार चक्र के आगे पढ़िए पाठकों के सवालों के जवाब के साथ सहस्रार चक्र पर आधारित जानकारी विस्तृत रूप से अगले लेख में।
ऊर्ध्व और अधः क्रम का चक्रों पर प्रभाव
अधः क्रम की ऊर्जा निचले चक्रों – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, में सक्रिय होती है।
ऊर्ध्व क्रम की ऊर्जा उच्च चक्रों – आज्ञा, सहस्रार, में प्रवाहित होती है।
इन दोनों का संतुलन शरीर और मन को पूर्णता की ओर ले जाता है।
ऊर्ध्व और अधः क्रम का समाज पर प्रभाव
ऊर्जा प्रवाह का यह विज्ञान केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह समाज के संतुलन और नैतिकता को भी प्रभावित करता है।
ऊर्ध्व क्रम से प्रेरित समाज- उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों की ओर अग्रसर। ध्यान, योग, और आत्मज्ञान की दिशा में उन्नति।
अधः क्रम से प्रेरित समाज- भौतिक सुख और वासनाओं की ओर झुकाव। प्रजनन और जनसंख्या वृद्धि का केंद्र।
संतुलन का महत्व- ऊर्ध्व और अधः क्रम के बीच संतुलन समाज को नैतिकता और कामुकता के बीच सामंजस्य स्थापित करने में मदद करता है।
ऊर्ध्व और अधः क्रम का समग्र महत्व
ऊर्ध्व और अधः क्रम का विज्ञान केवल कामकला तक सीमित नहीं है। यह मानव जीवन, शरीर, मन, और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। ऊर्ध्व क्रम: मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास, और आत्मसाक्षात्कार। अधः क्रम: शारीरिक संतुष्टि, प्रजनन क्षमता, और सृजनात्मक ऊर्जा। इन दोनों के बीच सामंजस्य बनाए रखने से व्यक्ति और समाज दोनों की उन्नति संभव है।
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