देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

Amit Srivastav

Updated on:

देवरिया में हजरत शहीद सैय्यद अब्दुल गनी शाह बाबा की मजार पर चला बुलडोजर सिर्फ एक ज्ञ निर्माण गिराने की प्रशासनिक कार्रवाई नहीं था, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति की दिशा, सरकार की प्राथमिकताओं और सत्ता की कार्यशैली का एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन बन चुका है।

जिस जगह पर वर्षों से धार्मिक आस्था, सामाजिक रस्में और स्थानीय पहचान जुड़ी हुई थीं, वहां एक ही दिन में बुलडोजर का गरजना यह बताने के लिए काफी है कि अब प्रदेश में सत्ता का संदेश सीधा और साफ है—कानून या तो सब पर लागू होगा, या फिर उसका कोई अर्थ ही नहीं बचेगा। यह कार्रवाई उस राजनीति की उपज है जिसमें शासन यह दिखाना चाहता है कि वह “भावनाओं से नहीं, फैसलों से चलता है।”

देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है


इस पूरी घटना को अगर सतह से नीचे जाकर देखा जाए, तो साफ दिखता है कि मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि “राजनीतिक नैरेटिव” का है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से बुलडोजर एक प्रतीक बन चुका है—सख्ती का, नियंत्रण का और यह बताने का कि सरकार अब किसी भी तरह के अवैध कब्जे या समानांतर सत्ता केंद्रों को बर्दाश्त नहीं करेगी।

देवरिया की घटना उसी सिलसिले की एक और कड़ी है, लेकिन यहां मामला और ज्यादा संवेदनशील इसलिए है क्योंकि यह सीधे धार्मिक स्थल से जुड़ा हुआ है। सरकार जानती थी कि इस कदम की गूंज केवल प्रशासनिक गलियारों में नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में भी दूर तक जाएगी।


यह भी एक संयोग नहीं है कि इस कार्रवाई के पीछे स्थानीय विधायक की सक्रिय भूमिका सामने आई। भारतीय राजनीति में अक्सर “कानून का पालन” भी राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना आगे नहीं बढ़ पाता। डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी द्वारा इस मुद्दे को उठाया जाना और उसे लगातार आगे बढ़ाया जाना यह दिखाता है कि अब सत्ता के भीतर यह सोच मजबूत हो रही है कि “अवैधता” को नजरअंदाज करना भी एक तरह का अपराध है।

देवरिया का बुलडोजर

देवरिया का बुलडोजर

लेकिन यहां एक सवाल भी उठता है—क्या ऐसी कार्रवाइयों की प्राथमिकता हमेशा समान रहती है, या फिर यह राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से तय होती है?


देवरिया का यह मामला उस बड़े राजनीतिक प्रयोग का हिस्सा लगता है जिसमें सरकार “बुलडोजर मॉडल” को अपनी प्रशासनिक पहचान बना चुकी है। यह मॉडल समर्थकों के लिए “कठोर लेकिन जरूरी” है, जबकि आलोचकों के लिए “डर और शक्ति प्रदर्शन” का प्रतीक। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है। कानून का पालन जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून हर जगह, हर मामले में, उसी तेजी और सख्ती से लागू होता है? या फिर कुछ मामले ज्यादा “दृश्यमान” और “राजनीतिक रूप से लाभकारी” होते हैं?


इस घटना का सामाजिक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना राजनीतिक। एक धार्मिक स्थल को गिराया जाना, भले ही वह कानूनी रूप से अवैध क्यों न हो, समाज के एक हिस्से के लिए भावनात्मक झटका होता है। सरकार और प्रशासन यह तर्क देते हैं कि यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि अवैध निर्माण के खिलाफ है। तर्क सही है, लेकिन राजनीति में तर्क से ज्यादा मायने धारणा (perception) रखती है। और धारणा यही बनती है कि सत्ता अपनी ताकत दिखा रही है। यही वजह है कि ऐसी हर कार्रवाई के साथ समर्थन और विरोध—दोनों की आवाजें तेज हो जाती हैं।


यह भी गौर करने वाली बात है कि मजार कमेटी ने विरोध का रास्ता नहीं चुना और अदालत के फैसले को स्वीकार किया। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है कि विवाद अंततः कानून के दायरे में सुलझा। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हर समुदाय, हर समूह को हर मामले में यही कानूनी और शांतिपूर्ण रास्ता अपनाने का मौका और भरोसा मिलता है? या फिर कई बार लोग सिस्टम से इतनी दूरी महसूस करने लगते हैं कि टकराव ही एकमात्र रास्ता दिखता है?


राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इस तरह की कार्रवाइयाँ सरकार की “सख्त छवि” को मजबूत करती हैं। यह छवि चुनावी राजनीति में एक खास वर्ग को आकर्षित करती है, जो व्यवस्था, अनुशासन और त्वरित फैसलों को प्राथमिकता देता है। लेकिन दूसरी ओर, यही छवि कुछ लोगों में यह डर भी पैदा करती है कि कहीं शासन “संवेदनशीलता” की जगह सिर्फ “शक्ति” पर ही भरोसा तो नहीं करने लगा है। लोकतंत्र में सरकार का मजबूत होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है उसका न्यायपूर्ण और संतुलित होना।


देवरिया का बुलडोजर एक और सवाल छोड़ जाता है—क्या विकास और कानून के नाम पर सिर्फ तोड़ना ही समाधान है, या फिर कहीं न कहीं संवाद, पुनर्वास और वैकल्पिक समाधान की राजनीति भी होनी चाहिए? आज की राजनीति में “तोड़ने” की तस्वीरें ज्यादा तेजी से वायरल होती हैं, ज्यादा असर छोड़ती हैं, लेकिन “जोड़ने” की कोशिशें अक्सर कैमरे से बाहर रह जाती हैं।


अंततः, यह घटना उत्तर प्रदेश की राजनीति के उस मोड़ को दिखाती है जहां सत्ता अपने फैसलों के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि अब कोई भी “ग्रे एरिया” नहीं बचेगा। या तो आप कानून के साथ हैं, या फिर कानून आपके दरवाजे पर आएगा—बुलडोजर के साथ। सवाल यह नहीं है कि देवरिया में जो हुआ वह कानूनी था या नहीं; सवाल यह है कि क्या यही मॉडल भविष्य में हर विवाद, हर समस्या और हर सामाजिक जटिलता का समाधान बनने जा रहा है?


देवरिया का यह दिन सिर्फ एक ढांचे के गिरने का दिन नहीं था, बल्कि यह उस राजनीति के उभार का दिन था जिसमें सत्ता, प्रशासन और प्रतीक—तीनों एक साथ चलते हैं। और शायद यही वजह है कि यह घटना खबर से ज्यादा, एक राजनीतिक बयान बन चुकी है। amitsrivastav.in पर उपलब्ध है दुर्लभ से दुर्लभ जानकारी।

click on the link ब्लाग पोस्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

देवरिया 5 जून: पर्यावरण संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी— सभाकुंवर कुशवाहा

देवरिया 5 जून। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर स्थानीय तहसील क्षेत्र के ग्राम करही भुवन में भाजपा भाटपार रानी मंडल के द्वारा वृक्षारोपण एवं पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और हरित वातावरण को बढ़ावा देना था।इस अवसर पर दर्जनों पौधे लगाए … Read more
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

Astro Physics, AI और Robotics की रहस्यमयी दुनिया: क्यों तेजी से बढ़ रहा है युवाओं में विज्ञान सीखने का 1 जुनून?

Astro Physics, AI और Robotics की रहस्यमयी दुनिया क्यों युवाओं को आकर्षित कर रही है? जानिए Black Hole, Space Science, Artificial Intelligence, Robots, Alien Life और भविष्य की तकनीकों का एक विस्तृत शैक्षणिक विश्लेषण। आज की युवा पीढ़ी केवल पारंपरिक शिक्षा, नौकरी और मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है। इंटरनेट, Artificial Intelligence, Space Research … Read more
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

देवरिया में आंगनबाड़ी नियुक्ति विवाद महिला ने डीएम से की निष्पक्ष जांच की मांग

देवरिया जिले के भागलपुर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम गहिला में आंगनबाड़ी कार्यकत्री की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। गांव की निवासी कमलावती सिंह ने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया है कि वर्ष 2004 में उन्हें विधिवत चयनित किए जाने के बावजूद बाद में साजिश के तहत कुछ वर्ष बाद हटाकर दूसरी … Read more
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

Kisan Sammelan Gwalior In Nidhi Singh: पूर्व ब्लैक कैट कमांडर्स ने 1 राम दरबार भेंट कर किया अभिनंदन

ग्वालियर में आयोजित कृषि सम्मेलन Kisan Sammelan Gwalior में पूर्व ब्लैक कैट कमांडर्स ने निधि सिंह को राम दरबार भेंट कर सम्मानित किया। निधि सिंह ने किसानों को प्राकृतिक खेती, सहकारिता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया। ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल संभाग में आयोजित एक भव्य सहकारिता कृषि सम्मेलन में देश-विदेश में अपनी उपलब्धियों और … Read more
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

20 May Deoria: वेतन संकट से जूझ रहे स्वास्थ्य कर्मियों का फूटा गुस्सा, काली पट्टी बांधकर जताया विरोध — “जनता की सेवा करें या परिवार बचाएं?”

20 May Deoria। में एनएचएम कर्मियों, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सीएचओ और डॉक्टरों ने लंबित वेतन के विरोध में काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया। जानिए वेतन संकट, कर्मचारियों की मांग और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाले असर की पूरी रिपोर्ट। महीनों से लंबित वेतन ने स्वास्थ्य कर्मियों को आर्थिक और मानसिक संकट में धकेला।देवरिया में स्वास्थ्य … Read more
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

NCF 2023 के संदर्भ में भाषा शिक्षण: गहन अध्ययन, कौशल और रचनात्मकता की तरफ

नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा 2023 (NCF 2023) ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव लाया है। भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि पुरानी रट्टू प्रणाली को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। हिंदी भाषा को अब ‘कोर्स A और B’ के स्थान पर … Read more
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

जनगणना-2027 : देश की आबादी गिनने से पहले सरकार मोबाइल की औकात क्यों गिन रही है?

जनगणना-2027 पर बड़ा सवाल सरकारी काम या महंगे स्मार्टफोन बेचने की योजना? जनगणना-2027 एप्स पुराने एंड्रॉयड मोबाइल में न चलने पर प्रगणकों में नाराजगी। क्या डिजिटल इंडिया के नाम पर कर्मचारियों पर महंगे मोबाइल और डेटा खर्च का दबाव डाला जा रहा है? प्रगणकों की जेब पर डिजिटल हमला! जनगणना-2027 एप्स पर व्यंग्यात्मक विश्लेषण। पुराने … Read more
कामाख्ये वरदे देवी नील पर्वत वासिनी। त्वं देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते।। sexual intercourse भोग संभोग

Yoni Sadhana Vidhi योनि साधना अदृष्ट शक्ति का महाप्रवाह वृहद तांत्रिक ग्रंथ 40 अध्याय

Yoni Sadhana Vidhi —तंत्र, शक्ति, कुण्डलिनी और ब्रह्माणी योनि का गूढ़ विज्ञान। वाममार्ग व दक्षिणमार्ग साधना का विस्तृत आध्यात्मिक वर्णन कामेश्वरी देवी कामाख्या की मार्गदर्शन में। जानें योनि साधना क्या है सम्पूर्ण मार्गदर्शिका। भूमिका/प्रस्तावनायोनि साधना: अदृष्ट शक्ति का महाप्रवाह केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय तांत्रिक परंपरा के उस गूढ़ विज्ञान का उद्घाटन है, जिसे … Read more
देवरिया का बुलडोजर: जब जमीन नहीं, सत्ता की मंशा साफ होती है

16 मई: वेतन भुगतान में देरी से स्वास्थ्य कर्मियों में बढ़ी नाराजगी, परिवार चलाना हुआ मुश्किल

देवरिया 16 मई। जनपद देवरिया में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को मार्च माह से वेतन न मिलने के कारण भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। चाहे फील्ड में कार्यरत कर्मचारी हों या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर तैनात स्वास्थ्य कर्मी, सभी वेतन भुगतान में हो रही देरी … Read more
यक्षिणी साधना, सरल यक्षिणी साधना, काम यक्षिणी Yakshini sadhna

56 प्रकार के भोग में सबसे उत्तम भोग सम्भोग: धर्म, तंत्र, योग और विज्ञान के अनुसार प्रेम, ऊर्जा और चेतना का रहस्य

भारतीय दर्शन, तंत्र, योग, आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान के अनुसार सम्भोग को सबसे उत्तम भोग क्यों कहा गया? जानिए 56 प्रकार के भोग, शिव-शक्ति, कुंडलिनी, प्रेम, ऊर्जा, मानसिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चेतना का गहन विश्लेषण। भारतीय संस्कृति में “भोग” शब्द का अर्थ केवल भोजन, धन, वैभव या इंद्रिय सुख तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह … Read more

Leave a Comment