कायस्थों का ननिहाल नागलोक

Amit Srivastav

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कायस्थों का ननिहाल नागलोक

यहां जानें कायस्थ वंश की उत्पत्ति कैसे हुईं, ननिहाल नागलोक क्यों मानी जाती है, पुर्वजो का इतिहास क्या है, सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी के कार्य का लेखा-जोखा रखने वाले, सभी के कर्मो का फल निर्धारित करने वाले भगवान श्री चित्रगुप्त जी, के बारह पुत्रों का सम्पूर्ण इतिहास। भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज के देव वंश-अमित श्रीवास्तव की कर्म-धर्म लेखनी में।

कायस्थ वंश पहले कहाँ के राजा थे? कायस्थों का ननिहाल नागलोक कैसे माना जाता है 

भगवान चित्रगुप्त की दो शादियाँ हुईं,  जिनसे बारह पुत्र थे और बारह पुत्रों का विवाह नागराज बासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ था, जिससे कि कायस्थों की ननिहाल नागलोक मानी जाती है। चित्रगुप्त जी की पहली पत्नी सूर्यदक्षिणा/नंदनी जो ब्राह्मण कन्या थी, इनसे 4 पुत्र हुए जो भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू कहलाए। दूसरी पत्नी एरावती/शोभावति नागवन्शी क्षत्रिय कन्या थी, इनसे 8 पुत्र हुए जो चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र,और अतिन्द्रिय कहलाए। जिसका उल्लेख अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों में भी दिया गया है। श्री चित्रगुप्तजी महाराज के बारह पुत्रों का विवाह नागराज बासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ, जिससे कि कायस्थों की ननिहाल नागवंश नागलोक मानी जाती है और नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है। माता सूर्यदक्षिणा/नंदिनी श्राद्धदेव की कन्या के चार पुत्र काश्मीर के आस -पास जाकर बसे तथा ऐरावती/शोभावति के आठ पुत्र गौड़ देश के आसपास बिहार, उड़ीसा, तथा बंगाल में जा बसे। बंगाल उस समय गौड़ देश कहलाता था, पद्म पुराण में इसका उल्लेख किया गया है। माता सूर्यदक्षिणा/नंदिनी के पुत्रों का विवरण कुछ इस तरह है। 

कायस्थों का ननिहाल नागलोककायस्थ जाति का इतिहास। कायस्थों का ननिहाल नागलोक क्यूँ माना जाता है। कायस्थ किसके वंशज हैं। कायस्थ देव वंश कैसे हैं। कायस्थ ब्राम्हण समाज से उच्च होते हैं इसका प्रमाण क्या है? सम्पूर्ण सवालों का जवाब इस लेख से सम्बंधित लेखों मे। पढ़ते रहिए amitsrivastav.in पर ।

1-भानु, श्रीवास्तव – राशि नाम धर्मध्वज था। चित्रगुप्त जी ने श्री श्रीभानु को श्रीवास, श्रीनगर और कान्धार के इलाके में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ। उस विवाह से श्री देवदत्त और श्री घनश्याम नामक दो दिव्य पुत्रों की उत्पत्ति हुई। श्री देवदत्त को कश्मीर का एवं श्री घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला। श्रीवास्तव दो वर्गों में विभाजित हैं यथा खर एवं दूसर। कुछ अल इस प्रकार हैं – वर्मा, सिन्हा, अघोरी, पडे, पांड्या, रायजादा, कानूनगो, जगधारी, प्रधान, बोहर, रजा सुरजपुरा, तनद्वा, वैद्य, बरवारिया, चौधरी, रजा संडीला, देवगन इत्यादि
 
2- विभानू, सूर्यध्वज – राशि नाम श्यामसुंदर था। उनका विवाह देवी मालती से हुआ। महाराज चित्रगुप्त ने श्री विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। चूंकि उनकी माता दक्षिणा सूर्यदेव की पुत्री थीं, तो उनके वंशज सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाये और सूर्यध्व्ज नाम से जाने गए। अंततः वह मगध में आकर बसे। 
 
3- विश्वभानू, बाल्मीकि –  राशि नाम दीनदयाल था और वह देवी शाकम्भरी की आराधना करते थे। महाराज चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। श्री विश्वभानु का विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ। यह ज्ञात है की उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया। इस तपस्या के समय उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढका हुआ था। उनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने। उनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात में जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए। आज वह गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं। गुजरात में उनको “वल्लभी कायस्थ” भी कहा जाता है। 
 
4 – वीर्यभानू, अष्ठाना – राशि नाम माधवराव था और उन्हीं ने देवी सिंघध्वनि से विवाह किया। वे देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे। महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री वीर्यभानु को आधिस्थान में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। उनके वंशज अष्ठाना नाम से जाने गए और रामनगर- वाराणसी के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया। आज अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान, चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं। मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या ध्यान रखने योग्य है। वह पांच अल में विभाजित हैं। 
माता ऐरावती/शोभावति के पुत्रों का विवरण कुछ इस प्रकार हैं। 
कायस्थों का ननिहाल नागलोक

 

1- चारु, माथुर– वह गुरु मथुरे के शिष्य थे। उनका राशि नाम धुरंधर था और उनका विवाह देवी पंकजाक्षी से हुआ। वह देवी दुर्गा की आराधना करते थे। महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। उनके वंशज माथुर नाम से जाने गए उन्होंने राक्षसों, जोकि वेद में विश्वास नहीं रखते थे को हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया। इसके पश्चात् उनहोंने आर्यावर्त के अन्य हिस्सों में भी अपने राज्य का विस्तार किया। माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई पद ग्रहण किये। माथुर तीन वर्गों में विभाजित हैं यथा देहलवी, खचौली एवं गुजरात के कच्छी। उनके बीच चौरासी अल हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया, रानोरिया इत्यादि। इटावा के मदनलाल तिवारी द्वारा लिखित मदन कोश के अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की आज के समय में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था। माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे। 
 
2- सुचारु, गौड़ – वह गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था। वह देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे। महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री सुचारू को गौड़ क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था। श्री सुचारू का विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ था। गौड़ पांच वर्गों में विभाजित हैं : 1. खरे 2. दुसरे 3. बंगाली 4. देहलवी 5. वदनयुनि। गौड़ कायस्थ को बत्तीस अल में बांटा गया है। गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त प्रसिद्द हैं। 
 
3- चित्र, चित्राख्य, भटनागर – वह गुरू भट के शिष्य थे। उनका विवाह देवी भद्रकालिनी से हुआ था। वह देवी जयंती की अराधना करते थे। महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। उन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए। उनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए। भटनागर चौरासी अल में विभाजित हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- दासनिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया, बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि। भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है। 
 
4- मतिभान, हस्तीवर्ण, सक्सेना – माता शोभावती, इरावती के तेजस्वी पुत्र का विवाह देवी कोकलेश से हुआ था। वे देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे। चित्रगुप्त जी ने श्री मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा। उनके पुत्र एक महान योद्धा थे और उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया। चूंकि वह शक् थे और शक् साम्राज्य से थे तथा उनकी मित्रता सेन साम्राज्य से थी, तो उनके वंशज शकसेन या सक्सेना कहलाये। आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था। आज वे कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटावा, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते हैं। सक्सेना ‘खरे’ और ‘दूसर’ में विभाजित हैं और इस समुदाय में एक सौ छव अल हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- जोहरी, हजेला, अधोलिया, रायजादा, कोदेसिया, कानूनगो, बरतरिया, बिसारिया, प्रधान, कम्थानिया, दरबारी, रावत, सहरिया, दलेला, सोंरेक्षा, कमोजिया, अगोचिया, सिन्हा, मोरिया, इत्यादिकमोजिया, अगोचिया, मोरिया, इत्यादि। 
 
5- हिमवान, अम्बष्ठ – उनका राशि नाम सरंधर था और उनका विवाह देवी भुजंगाक्षी से हुआ। वह देवी अम्बा माता की अराधना करते थे। गिरनार और काठियवार के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा। श्री हिमवान की पांच दिव्य संतानें हुईं श्री नागसेन , श्री गयासेन, श्री गयादत्त, श्री रतनमूल और श्री देवधर। ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया। इनका विभाजन : नागसेन चौबीस अल , गयासेन पैंतीस अल, गयादत्त पचासी अल, रतनमूल पचीस अल, देवधर इक्कीस अल में है। अंततः वह पंजाब में जाकर बसे जहाँ उनकी पराजय सिकंदर के सेनापति और उसके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के हाथों हुई। अम्बष्ट कायस्थ बिजातीय विवाह की परंपरा का पालन करते हैं और इसके लिए “खास घर” प्रणाली का उपयोग करते हैं। इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी इस्तेमाल किये जाते हैं। ये “खास घर” जिनसे मगध राज्य के उन गाँवों का नाम पता चलता है जहाँ मौर्यकाल में तक्षशिला से विस्थापित होने के उपरान्त अम्बष्ट आकर बसे थे। इनमें से कुछ घरों के नाम हैं- भीलवार, दुमरवे, बधियार, भरथुआर, निमइयार, जमुआर, कतरयार पर्वतियार, मंदिलवार, मैजोरवार, रुखइयार, मलदहियार, नंदकुलियार, गहिलवार, गयावार, बरियार, बरतियार, राजगृहार, देढ़गवे, कोचगवे, चारगवे, विरनवे, संदवार, पंचबरे, सकलदिहार, करपट्ने, पनपट्ने, हरघवे, महथा, जयपुरियार आदि। 
 
6- चित्रचारु, निगम- उनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह अशगंधमति से हुआ। वह देवी दुर्गा की अराधना करते थे। महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र, सरयू नदी के तट पर में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा। आज के समय में कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, बंदा, जालौन, महोबा में रहते हैं। वह तैत्तिरीय अल में विभाजित हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कानूनगो, अकबरपुर, अकबराबादी, घताम्पुरी, चौधरी, कानूनगो बाधा, कानूनगो जयपुर, मुंशी इत्यादि। 
 
7- चित्रचरण, कर्ण – उनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह देवी कोकलसुता से हुआ था। वह देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे। महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चारूण को कर्ण क्षेत्र, आधुनिक कर्नाटक में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। उनके वंशज समय के साथ उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और आज नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं। उनकी बिहार की शाखा दो भागों में विभाजित है। ‘गयावाल कर्ण’ जो गया में बसे और ‘मैथिल कर्ण’ जो मिथिला में जाकर बसे। इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि, मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि पदवी प्रचलित है। मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है। पंजी वंशावली रिकॉर्ड की एक प्रणाली है। कर्ण तीन सौ साठ अल में विभाजित हैं। इस विशाल संख्या का कारण वह कर्ण परिवार हैं जिन्होने कई चरणों में दक्षिण भारत से उत्तर की ओर पलायन किया। इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। 
 
8- चारुण, श्री अतिन्द्रिय, कुलश्रेष्ठ – उनका राशि नाम सदानंद है और उन्होंनें देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया। वह देवी लक्ष्मी की आराधना करते हैं। महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री अतिन्द्रिय, जितेंद्रिय को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था। श्री अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से अधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाली संतानों में से थे। उन्हें ‘धर्मात्मा’ और ‘पंडित’ नाम से जाना गया और स्वभाव से धुनी थे। उनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए। आधुनिक काल में वे मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, इटावा और मैनपुरी में पाए जाते हैं। कुछ कुलश्रेष्ठ जो की माता नंदिनी के वंश से हैं, नंदीगांव – बंगाल में पाए जाते हैं।
कायस्थों का ननिहाल नागलोक

 

कायस्थो का ननिहाल : नागलोक – चित्रगुप्त वंशज अमित श्रीवास्तव 

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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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