यदि कोई औरत किसी अन्य पुरूष से पुत्र प्राप्त कर ले, तो उस पर किसका अधिकार रहेगा? तिरिया चरित्र दैवों न जाने रोचक कहानी –
एक गाँव था, उसमें एक गरीब आदमी रहता था। उसकी शादी हो गई, पती पत्नी दोनो आराम से रहने लगे। कुछ दिनों बाद वह आदमी अपनी पत्नी से बोला – मै अब बाहर व्यापार करने जा रहा हूँ, आज ही के दिन एक बरस बाद लौट कर आऊँगा।
ऐसा कह कर पति चला गया, पति वहाँ व्यापार में व्यस्त हो गया और पत्नी यहाँ अकेली थी, पत्नी रोज सुबह नहा धोकर पैदल ही बाजार जरुरतों की सामान खरीदने चली जाती थी, उसी बाजार में एक धनवान पुरूष भी रोज कार से सब्जी वगैरह खरीदने आता था, वह रोज इस महिला को आते हुए देखता था, एक दिन वह पुरूष उस महिला से बोला – आओ मै आपको घर तक छोड़ दूँगा।
महिला बोली नहीं नही ! मै चली जाऊँगी। डरो मत !! मेरा घर भी आपके अगली गली में है, मै आपको सकुशल पहुँचा दूँगा, अब वह स्त्री कार में बैठ गई, उस पुरूष ने शांति विनम्रता और शालीनता के साथ उस स्त्री को उसके घर के सामने उतार कर चला गया, अब यह रोज का क्रम बन गया।
एक दिन वह पुरूष उस स्त्री से स्नेह तथा आदर से बोला – आओ चाय पीकर चली जाना, स्त्री ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया तथा चाय पीकर चली गई, सिलसिला आगे बढ़ा भोजन भी होने लगा, उन दोनो के मध्य प्रेम उत्पन्न हो गया और परिणाम हुआ –
एक सुन्दर पुत्र की प्राप्ति। अब वह स्त्री अपने पुत्र को उस पुरूष के घर ही रखती व नित्य एक बार जाकर उसे लाड़ प्यार से दूध पिला कर लौट आती। एक बरस पूरा हो गया, पति के लौट आने की तारीख़ आ गई। पति आ गया।
अब पत्नी का ध्यान पुत्र में होने के कारण वह पति की बातों पर ध्यान न दे पा रही थी, उसे अशांत व खिन्न देखकर पति ने उससे पूछा – सच सच बताओ क्या हुआ ? तब पत्नी ने सब बात कह दी और पुत्र की याद आना बताया। पति बोला – अपना पुत्र है। जा ले आ। पत्नी गई और जाकर उस पुरूष से बोली कि मेरे पति आ गये हैं और मै अपना पुत्र लेने आई हूँ, वह पुरूष बोला – पुत्र नही दूँगा, वह मेरा है। अब स्त्री और उसका पति दोनों पुत्र माँग रहें हैं तथा वह पुरूष पुत्र को अपने पास रखना चाहता है।
मामला न्यायालय में गया। न्यायाधीश के समक्ष सबने अपने तर्क़ सुनाए। पति ने कहा – जब मेरी शादी हुई तो मेरे पास 5 एकड़ जमीन थी। मै व्यापार करने परदेश गया तथा यह कहकर गया कि जब बोवनी का समय आएगा तब मै आ जाऊँगा परन्तु यदि किसी कारण न आ पाऊँ तो तू किसी से खेत बुआ लेना, बरसात शुरू हो गई और मै न आ पाया तो मेरी पत्नी ने मेरा खेत दूसरे से बुआ लिया, अब बोने वाला व्यक्ति कह रहा है कि फसल मेरी है। तो फसल तो खेत मालिक की ही रहेगी। बुआई करने वाला व्यक्ति चाहे तो मजदूरी ले ले। परन्तु फसल पर अधिकार तो खेत मालिक का ही रहेगा।
दूसरे पुरूष ने कहा – मै एक रोज सैर करने गया, सड़क पर मुझे एक खाली डिब्बी पड़ी मिली, मैने इधर उधर देखा – मुझे कोई डिब्बी का मालिक दिखाई न दिया, डिब्बी सुन्दर थी। मैने डिब्बी उठा ली तथा अपने जेब से एक हीरा निकाल कर डिब्बी मे रख दिया, दूसरे दिन मुझे एक आदमी मिला, वह कहने लगा यह डिब्बी तो मेरी है।
मैने डिब्बी मे से हीरा निकाल कर अपने पास रख लिया और डिब्बी उसके मालिक को लौटा दी, अब वह आदमी कहता है कि हीरा भी मुझे दो। हीरा तो मैने रखा था तो हीरा तो मै ही रखूँगा, उसकी डिब्बी मै वापस देने को तैयार हूँ पर हीरे का मालिक तो मै ही हूँ।
पत्नी ने कहा – जब मेरी शादी हुई तो मेरे पिता ने एक भैंस दी थी, भैंस दूध देती थी, एक दिन लालसा हुई दही जमाने की लेकिन मेरे पास जोरन नही था। दूध को जमाकर दही बनाकर घी निकालने के लिए दूध में थोड़ा सा दही डालना पडता है उसे जोरन कहते हैं। मैने एक पड़ौसी से माँगकर जामन- जोरन ले लिया तथा दूध जमा लिया फिर मैने उस दही की देखभाल की तथा मथ कर घी निकाला। अब वह जोरन देने वाला कह रहा है कि घी मेरा है। घी तो उस का ही रहेगा जिसका दूध था। जरा सा जोरन दे देने से घी उसका कैसे हो सकता है ? वह चाहे तो जोरन के पैसे ले ले ?
तीनों के अपने अपने किस्से व तर्क थे, तीनों की बात सुनकर न्यायाधीश महोदय ने सुनवाई स्थगित कर दिया। अब पुत्र किसे मिलना चाहिये ? यहां एक विचारणीय जजमेंट के लिए थोड़ा अगले दिन का इन्तज़ार करें। अब आज अगले दिन न्यायालय की सुनवाई शुरू हुई सभी साक्ष्यों बयानों के आधार पर यह निर्णय आया भैस दुधारू है तो दूध देगी दही जमाने के लिए जोरन पड़ोसी के हामी से महिला को मिला और पड़ोसी का जामन दूध में डाल दिया। अब तिरिया चरित्र से निकला धी उस तिरिया को दिया जाए और जमीन मालिक को तैयार फसल चाहिए यह उसकी जमीनी अधिकार है।
दूसरे ब्यक्ति को – खाली लावारिस डिब्बी में हिरा रखना गैरकानूनी करार देते हुए दफा 376 के अनर्गत दस साल की सजा मुकम्मल की जाती है। उस धनवान ब्यक्ति को दही जमाने के लिए तिरिया को जोरन देना महंगा पडा, उस खाली डिब्बी में हिरा रखने वाले ब्यक्ति से मतलब के बाद अपनी तिरिया चरित्र दैवों न जाने की कहावत उस औरत ने चरितार्थ कर दिखाया।
जैसा कि सब जानते हैं तिरिया का हजार रुप होता है और जो लोग पराई तिरिया के झांसे में आ जाते हैं उन्हें तरह-तरह के परेशानीयो में पड़ना ही पड़ता है।
शिक्षा – गैर औरत को अपनी अमानत कभी न समझें। तिरिया चरित दैवों न जाने तो मनुष्य भला कैसे जान सकता।

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समाज के लिए मार्गदर्शी लेख- पुरुष किसी लड़की औरत के झांसे में आकर ऐसा न करें कि वो मोहरा बनाकर समाज में बनी बनाई छबि धूमिल करने में सफल हो। त्रिया चरित्र दैवों न जाने तो मनुष्य भला कैसे जान सकता है।
Very nice