मैं अभिषेक कांत पांडेय; जीवन की सच्ची चुप्पा और क्रोधी की कहानी जो मेरे जीवन में किरदार मिलते गए, जिसे मैंने कभी उस समय जवाब नहीं दिया क्योंकि मैं अपने जीवन में मस्त रहता था और आज भी। तत्कालीन (समय) में उन्हें कोई जवाब नहीं देता था बल्कि अपनी मस्ती की धुन में रहता था।
अभी कुछ दिन पहले यह ख्याल आया कि भाई ऐसे किरदारों को भी कुछ जवाब दिया जाए और वह लोग फेसबुक और सोशल मीडिया इत्यादि से जुड़े होंगे तो जवाब उनके पास तक पहुंच जाएगा। अपने तरीके से दुःख-तकलीफ ये जीवन में बहुत दिए हुए हैं तो थोड़ा बहुत तो हक हमारा भी बनता है, इनको थोड़ा सत्य से परिचित कराया जाए।
उन्हें जवाब देने के लिए अब छोटी कहानी लिखना भी शुरू कर दिया तो कहानी का आनंद जरुर लीजिएगा आपके आसपास भी ऐसे बहुत से लोग होंगे जो मेरी कहानी के पात्रों से मिलते होंगे तो आनंद लीजिए।

किसी छोटे-से शहर के एक व्यस्त अखबार के दफ्तर में, जहां स्याही की महक और खबरों की भागदौड़ दिन-रात चलती थी, वहां दो अनोखे किरदार रहते थे—चुप्पा और क्रोधी। ये दोनों ना तो पूरी तरह नास्तिक थे, ना ही आस्तिक। मैं उन्हें किसी एक डिब्बे में बांध नहीं पाता था। उनकी अपनी एक दुनिया थी, जहां तर्क और ताने एक-दूसरे से गूंथे हुए थे।
चुप्पा, जैसा कि नाम से जाहिर है, ज्यादा बोलता नहीं था। उसकी आंखें और चुप्पी ही उसकी बात कहती थी। लेकिन जब बोलता, तो शब्दों के तीर सीधे निशाने पर लगते। दूसरी तरफ क्रोधी था—उसका गुस्सा उसकी पहचान था। हर बात पर उसकी भवें तन जातीं, और मुंह से तर्कों की ऐसी बौछार होती कि सामने वाला सोच में पड़ जाए।
मजेदार बात ये थी कि जब ये दोनों साथ होते, तो एक-दूसरे की तारीफों के पुल बांधते। आस्तिकों का मजाक उड़ाते, मेरे मंगलवार के हनुमान जी के व्रत पर ठहाके लगाते। मैं चुपके से उनके तर्कों का मजा लेता, लेकिन मन ही मन सोचता—ये ना आस्तिक हैं, ना नास्तिक, बस अपने भ्रम की दुनिया में जी रहे हैं।
हमारे दफ्तर में एक मित्र थे, डिजाइनर, जिन्होंने इन दोनों के लिए मजेदार नाम गढ़े। क्रोधी को बुलाते थे “हलकट”, और चुप्पा का नाम… अरे हां, वो तो बस चुप्पा ही रह गया, क्योंकि उसका नाम याद रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लेकिन इन दोनों की एक खासियत थी—जब एक छुट्टी लेकर अपने गांव जाता, तो दूसरा उसकी बुराई में कोई कसर न छोड़ता।
जब चुप्पा छुट्टी पर जाता, क्रोधी मेरे पास आकर फुसफुसाता, “यार, ये चुप्पा तो बड़ा शातिर है। चुपके-चुपके सबकी टांग खींचता है, और ऊपर से बनता है संत!” और जब क्रोधी छुट्टी लेता, तो चुप्पा अपनी चुप्पी तोड़कर कहता, “ये क्रोधी तो बस गुस्सा ही जानता है। इसके पास दिमाग नाम की चीज होती, तो कुछ काम की बात करता।” मैं दोनों की बातें एक कान से सुनता, दूसरे से निकाल देता। क्योंकि सच कहूं, तो दोनों ही अपने-अपने तरीके से शातिर थे।
एक बार की बात है, मैं अपने मंगलवार के व्रत के लिए हनुमान मंदिर से पंजीरी लाया था। दोनों ने मिलकर मेरा ऐसा मजाक उड़ाया कि क्या बताऊं! क्रोधी तो बोला, “अरे, ये पंजीरी खाकर क्या भगवान तुम्हें नौकरी में तरक्की दे देंगे?” और चुप्पा, जो आमतौर पर कम बोलता था, हंसते हुए बोला, “हां, भाई, तू तो बस पंजीरी खा, और भगवान को बता कि क्रोधी और मैं नास्तिक हैं, हमें सुधार दे!” मैं हंस दिया, लेकिन मन में सोचा—इनके तर्क तो तेज हैं, पर इनके अंदर का आक्रोश और भ्रम इनके शब्दों से भी बड़ा है।
दरअसल, चुप्पा और क्रोधी की नास्तिकता कोई गहरी सोच से नहीं आई थी। वो बस किताबों और तर्कों का सहारा लेकर अपनी बात को हवा देते थे। जो भी पंजीरी वाला साहित्य इन्होंने पढ़ा था, उसे मेरे सामने उगल देते। लेकिन मैंने देखा कि इनके तर्कों में एक खालीपन था। इनके पास ना कोई गहरी नैतिकता थी, ना ही कोई ठोस विश्वास। बस एक आक्रोश था—क्रोधी में तो साफ दिखता था, और चुप्पा में छिपा हुआ था।
समय बीता, और धीरे-धीरे इन दोनों को जवाब मिलने लगा। कभी दफ्तर की बहसों में, कभी जिंदगी के सबक से। मैंने देखा कि जो लोग भ्रम में जीते हैं, वो देर-सबेर अपनी सच्चाई से टकराते हैं। आज भी जब मैं चुप्पा और क्रोधी को याद करता हूं, तो मन में एक हल्की-सी हंसी आती है। मैं उन्हें प्रणाम करता हूं—नहीं उनके लिए, बल्कि उस सबक के लिए जो उन्होंने मुझे सिखाया।
तो दोस्तों, अगर आपके आसपास भी कोई चुप्पा या क्रोधी है, जो ना आस्तिक है, ना नास्तिक, बल्कि अपने भ्रम में जी रहा है, तो बस एक काम कीजिए—उनके तर्कों का मजा लीजिए, लेकिन उनकी बातों को दिल से मत लीजिए। क्योंकि जिंदगी का असली जवाब ना तर्कों में है, ना आक्रोश में, बल्कि उस शांति में है, जो अपने विश्वास और नैतिकता से आती है।
Table of Contents

amitsrivastav.in पर कहानीकार: अभिषेक कांत पांडेय
@highlight

मतदाता जागरूकता का महत्व: लोकतंत्र की सांसें हमारी जागरूकता पर टिकी हैं – अमित श्रीवास्तव

अजय कुमार दुबे ने कहा मतदाता सूची शुद्धिकरण हम सबकी जिम्मेदारी

Yoni Sadhana योनि साधना का परम रहस्य: शक्ति-तत्व का वह गहन विज्ञान जिसे आज तक बहुत कम लोग समझ पाए

वफादारी की असली कीमत: सही इंसान को गलत समझने की 1 Wonderful सबसे बड़ी भूल

धीरे-धीरे हर चीज़ से लगाव खत्म हो रहा है — निराशा से आशा की ओर, निराशा से बाहर कैसे निकले? 1 Wonderful शक्तिशाली धार्मिक मार्गदर्शन

राधा कृष्ण: प्रेम का वह सत्य जिसे विवाह भी बाँध नहीं सकता

भारत में BLO द्वारा Absent/Shifted मतदाता को Present & Alive करने की 1नई डिजिटल प्रक्रिया

Modern Salesmanship आधुनिक बिक्री कला: भारतीय ग्राहकों को प्रभावित करने की रणनीतियाँ

अर्धनारीश्वर का वह स्वरूप जिसे आज तक कोई नहीं समझ पाया – कामाख्या से प्रकाशित दिव्य ज्ञान

श्री अर्धनारीश्वर स्तोत्र-महामाहात्म्यं कामाख्या-प्रकटितं विस्तीर्णरूपेण
click on the link ब्लाग पोस्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
प्लेबॉय, काल ब्वाय, जिगोलो, Indian escorts services, play boy job, मौज मस्ती के साथ नौकरी, पुरुष वेश्यावृत्ति का पर्दाफाशFebruary 15, 2024
योनि के 64 प्रकार: कामशास्त्र तांत्रिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सृजन और शक्ति का प्रतीक शिव-पार्वती संवादOctober 23, 2024
धीरे-धीरे हर चीज़ से लगाव खत्म हो रहा है — निराशा से आशा की ओर, निराशा से बाहर कैसे निकले? 1 Wonderful शक्तिशाली धार्मिक मार्गदर्शनDecember 4, 2025
गोरखनाथ- कौन थे, जन्म कैसे हुआ, गुरु कौन थे, शाबर मंत्र, मृत्यु कैसे हुई सम्पूर्ण जानकारीFebruary 21, 2024







