बीजेपी की विचारधारा: हिंदू मुस्लिम राजनीतिक ध्रुवीकरण का जानें सच

Amit Srivastav

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बीजेपी की विचारधारा – भारत की राजनीति में हिंदू मुस्लिम राजनीतिक ध्रुवीकरण की असली जड़ें ब्रिटिश ‘फूट डालो राज करो’ और मुस्लिम लीग की जिद में थीं, न कि कांग्रेस में। कांग्रेस ने गांधी-नेहरू के नेतृत्व में हमेशा एकता और सेकुलरिज्म को बढ़ावा दिया, जबकि बीजेपी-आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण को अपनी राजनीति का आधार बनाया।

हिंदू मुस्लिम राजनीति की जड़ें बीजेपी में, कांग्रेस पर आरोप क्यों?

आजादी से पहले और बाद में कांग्रेस ने हमेशा सेकुलरिज्म और एकता की नीति अपनाई, जबकि बीजेपी और उसके वैचारिक पिता आरएसएस ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। यह विडंबना है कि जो पार्टी खुद हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति पर टिकी है, वही कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती है। हकीकत यह है कि विभाजन का बीज ब्रिटिश ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति और मुस्लिम लीग की जिद ने बोया, न कि कांग्रेस ने। कांग्रेस ने तो गांधीजी के नेतृत्व में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए खूब प्रयास किए, लेकिन बीजेपी आज उस इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करती है।

शाहबानो केस में कांग्रेस ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाया, लेकिन बीजेपी इसे तुष्टिकरण बताकर अपनी सांप्रदायिक राजनीति को छिपाती है। राहुल गांधी का वायनाड से चुनाव लड़ना भी कोई मुस्लिम वोट बैंक की साजिश नहीं, बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय पहुंच का प्रतीक है। वायनाड में मुस्लिम आबादी करीब 40% है, न कि 80-90% जैसा दुष्प्रचार किया जाता है, और राहुल ने वहां विकास और एकता पर जीत हासिल की।

सवाल यह है कि जब बीजेपी खुद हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर सत्ता हासिल करती है, तो कांग्रेस की सेकुलर नीतियों पर आरोप क्यों लगाया जाता है? जबकि कांग्रेस ने राष्ट्रवाद को समावेशी बनाया, बीजेपी इसे हिन्दू राष्ट्रवाद में बदल रही है।

बीजेपी की विचारधारा: हिन्दू मुस्लिम राजनीतिक ध्रुवीकरण का जानें सच

भारत के राजनीतिक इतिहास में हिंदू मुस्लिम राजनीति का ठीकरा अक्सर कांग्रेस पर फोड़ा जाता है, लेकिन बीजेपी की विचारधारा का वास्तविकता यह है कि इसकी जड़ें आरएसएस और हिन्दू महासभा जैसी संगठनों में हैं, जो आज बीजेपी की विचारधारा का आधार हैं। आजादी से पहले कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में हिन्दू-मुस्लिम एकता की वकालत की, जबकि मुस्लिम लीग ने अलगाववाद को बढ़ावा दिया। 1909 के मोर्ले-मिंटो सुधारों में अलग मताधिकार ब्रिटिशों की साजिश थी, और कांग्रेस ने इसका विरोध किया था, लेकिन लीग ने इसे स्वीकार कर लिया।

कांग्रेस ने हमेशा सामान्य निर्वाचन की मांग की, ताकि सभी समुदाय एक साथ रहें। 1937 के चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद, उसने मुस्लिम लीग को सरकार में शामिल करने की कोशिश की, लेकिन जिन्ना की जिद ने इसे असफल कर दिया। क्रिप्स मिशन (1942) में भी कांग्रेस ने एकता पर जोर दिया, लेकिन लीग ने ब्रिटिशों का साथ देकर पाकिस्तान की मांग मजबूत की। गांधी और नेहरू ने विभाजन का विरोध किया, लेकिन हिंसा रोकने के लिए इसे स्वीकार किया। आज बीजेपी इस इतिहास को नेहरू पर दोष मढ़कर अपनी सांप्रदायिक राजनीति को जायज ठहराती है।

आजादी के बाद कांग्रेस ने सेकुलर संविधान बनाया, जहां सभी धर्मों को समान अधिकार दिए गए। अल्पसंख्यक मंत्रालय और वक्फ एक्ट जैसी नीतियां समानता के लिए थीं, न कि तुष्टिकरण के लिए। शाहबानो केस (1985) में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने का फैसला दिया, लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में कांग्रेस ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों की रक्षा) अधिनियम, 1986 पारित किया, जो महिलाओं के अधिकारों को सीमित करता था।

लेकिन यह एक गलती थी, जिसे बीजेपी आज बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है, जबकि खुद बीजेपी ने मुस्लिमों के खिलाफ सीएए-एनआरसी जैसे कानून लाकर ध्रुवीकरण किया। बीजेपी के शासन में मुस्लिमों पर हमले बढ़े, लव जिहाद और गौ रक्षा के नाम पर हिंसा हुई, और चुनावों में घृणा भाषण दिए गए। मोदी जी ने खुद मुस्लिमों को ‘घुसपैठिए’ कहा, जो सांप्रदायिकता की मिसाल है।

राहुल गांधी का वायनाड से चुनाव लड़ना कोई मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति नहीं है। वायनाड एक विविध क्षेत्र है, जहां मुस्लिम, ईसाई और हिन्दू समुदाय रहते हैं। राहुल ने वहां विकास, किसानों की मदद और एकता पर फोकस किया, न कि धर्म पर। बीजेपी इसे मुस्लिम बहुल बताकर दुष्प्रचार करती है, लेकिन हकीकत में यह कांग्रेस का मजबूत गढ़ है। उधर, बीजेपी वाराणसी जैसे हिन्दू बहुल क्षेत्रों में राम मंदिर और हिन्दू राष्ट्रवाद पर चुनाव जीतती है।

बीजेपी की विचारधारा राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि हिन्दू राष्ट्रवाद है, जो सेकुलरिज्म को कमजोर करती है। कांग्रेस ने हमेशा ‘सर्वधर्म समभाव’ को अपनाया, जबकि बीजेपी ‘हिन्दू खतरे में’ का नैरेटिव चलाती है। बाबरी मस्जिद विध्वंस, गुजरात दंगे और हाल के सीएए विरोधी प्रदर्शनों में हिंसा बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति के उदाहरण हैं। भारत को एकजुट रखने के लिए जरूरी है कि राजनीति तुष्टिकरण या ध्रुवीकरण से ऊपर उठे। कांग्रेस की गलतियां रही होंगी, लेकिन उसने विभाजन और दंगों से सीख ली।

आज बीजेपी वही गलतियां दोहरा रही है, जो राष्ट्र की अखंडता के लिए खतरा है। सवाल उठाना चाहिए: हिन्दू-मुस्लिम राजनीति की जड़ें किसने बोईं? जवाब है, ब्रिटिश और लीग ने, लेकिन आज इसे जारी रखने वाली बीजेपी है।

विभाजन की समयरेखा (1905 से 1947): 1905 बंगाल विभाजन (ब्रिटिश साजिश), 1906 मुस्लिम लीग गठन, 1916 लखनऊ समझौता (कांग्रेस-लीग एकता प्रयास), 1920 खिलाफत आंदोलन (गांधी का समर्थन एकता के लिए), 1932 कम्युनल अवॉर्ड (अलग निर्वाचन), 1937 चुनाव (कांग्रेस जीत, लीग अस्वीकृति), 1940 लाहौर प्रस्ताव (पाकिस्तान मांग), 1942 भारत छोड़ो आंदोलन (लीग का विरोध), 1946 कैबिनेट मिशन असफल, 1947 विभाजन। कांग्रेस ने हमेशा एकता की कोशिश की, लेकिन लीग की जिद और ब्रिटिश चाल ने विभाजन कर दिया।

आज बीजेपी सेकुलरिज्म को ‘छद्म सेकुलरिज्म’ कहकर हिन्दू राष्ट्रवाद थोप रही है, जो भारत की विविधता के खिलाफ है। कांग्रेस का इतिहास एकता का है, बीजेपी का ध्रुवीकरण का। समय आ गया है कि सच्चाई को पहचाना जाए। amitsrivastav.in पर मिलती है निस्पक्ष सुस्पष्ट जानकारी।

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Disclaimer:> यह सामग्री धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने के लिए नही बल्कि सद्भावना का संदेश सांस्कृतिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से है, न कि किसी भी प्रकार की धर्म पर कटाक्ष किया गया है। यह राजनीतिक दलों द्वारा हिंदू मुस्लिम राजनीति पर एक शैक्षणिक पालिटिक्स विश्लेषण है।

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